आनुवांशिकी


आनुवांशिकी 

आनुवांशिकता – विजान की वह शाखा जिसमे सजीवो के लक्षणों क आनुवांशिकता तथा विभिन्नताओ का अध्ययन किया जाता है | आनुवांशिकता कहलाता है |

आनुवांशिकता शब्द का सर्वप्रथम बेटसन ने सन 1905 में किया |

वंशागति – आनुवांशिकता लक्षणों का जनक पीढी से संतति पीढ़ी में संचरण वंशागति कहलाती है |

वंशागति शब्द का प्रतिपादन स्पेन्सर ने किया |

Q. 1 एक ही जाति के जीवो के मध्य विभिन्नताए क्यों पाई जाती है ?

उत्तर- जीन विनिमय

मेण्डल की जीव परिचय – ग्रेगर जान मेंडल का जन्म 22 जुलाई 1822 को आस्ट्रिया के हेन्जोंन्डोर्फ प्रान्त के सिलिसिया गाँव में हुआ | 1842 में इन्होने दर्शनशास्त्र की डिग्री प्राप्त की | 1843 में इन्हें आस्ट्रिया के ब्रून शहर में चर्च में पादरी बनाया गया | चर्च के उधान में मेंडल ने मटर के पौधे पर अपने प्रयोग किये | सन 1856 से 1863 तक मेंडल ने अपने प्रयोग मटर के पौधे पर किये | इन प्रयोगों के निष्कर्ष को सन 1856 में ब्रून सोसायटी ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के समक्ष    शोध पत्र   के रूप में प्रकाशित किये | मेंडल ने प्रयोगों के परिणाम के    आधार पर  कुछ  नियम प्रतिपादित  किये    जिन्हें आनुवांशिकता के नियम या मेंडलवाद भी कहा जाता है | 6 जनवरी 1884 को  चिरक्काली वृक्कशोथ बीमारी के कारण मेंडल की म्रत्यु हो गई |

आनुवांशिकी

आनुवांशिकी

Q. 2 मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए मटर के पौधों को ही क्यों चुना ? समझाइये |

उत्तर- मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए मटर के पौधों को ही चुना क्यों की –

  1. मटर का पौधा एक वर्षीय होता है | अत: एक वर्ष में ही इसकी अनेक पीढियों के अध्ययन किया जा सकता है |
  2. मटर के पुष्प बड़े एवं द्विलंगी होते है | अत: स्व: परागण द्वारा अनेक पौधे प्राप्त किये जा सकते है |
  3. विपुन्सन की प्रक्रिया द्वारा मटर के पौधों में परागण कराया जा सकता है |
  4. मटर के पौधों में अनेक जोड़ी विप्रयासी लक्षण पाये जाते है |




Q.3 मटर के पौधे का वास्तविक नाम लिखिए ?

उत्तर- पाईमस सटाइवम

Q. 4 मेंडल ने मटर के पौधे पर कितने जोड़ी विपर्यासी लक्षणों का अध्ययन किया और वे कौन-कौन से है ?

उत्तर- मेंडल ने मटर के पौधे पर सात जोड़ी विपर्यासी लक्षणों का अध्ययन किया और ये निम्लिखित थे –

  1. पादप की ऊचाई
  2. पुष्प का रंग
  3.  परिपक्व फली की आकृति
  4. पुष्प की स्थिति
  5. बीज की आकृति
  6. बीज का रंग

आनुवांशिकी शब्दावली 

  1. जीन- वह करक जो किसी एक लक्षण को नियंत्रित करता है | जीन कहलाता है | मेंडल ने जीन को कारक कहा |
  2. युग्मविकल्पी – किसी एक लक्षण को नियंत्रित करने वाले जीन के दो विपर्यासी स्वरूपों को युग्म विकल्पी कहते है | जैसे- पौधे की ऊचाई को नियंत्रित करने वाले दो युग्म विकल्पी T (ल.) (बौना) |
  3. समयुग्मजी – जब किसी लक्षण को नियंत्रित करने वाले जीन के दो युग्मविकल्पी एक समान हो तो उसे समयुग्मजी कहते है | जैस- TT , tt
  4. विषमयुग्मजी – जब किसी लक्षणों को नियंत्रित करने वाले जीन के दोनों युग्मविकल्पी असमान हो तो उसे विषमयुग्मजी कहते है | जैसे- Tt
  5. लक्षण प्ररूप ( फीनोटाइप ) – किसी सजीव को बाह्य प्रतीतो को लक्षण प्ररूप कहते है |
  6. जीन प्ररूप ( जीनोटाइप ) – किसी सजीव की आनुवान्सिकता रचना उसका जीन प्ररूप कहलाता है |
  7. प्रभावी लक्षण – ऐसे लक्षण जो F1 पीढ़ी से प्रकट होते है | प्रभावी लक्षण कहलाते है |
  8. अप्रभावी लक्षण- वे लक्षण जो F1 पीढ़ी में प्रकट नहीं हो पाते अप्रभावी लक्षण कहलाते है |
  9. एकसंकर संकरण – वह संकरण जिसमे एक लक्षण की वंशागति का अध्ययन किया जाता है उसे एकसंकर संकरण कहते है |
  10. परीक्षण संकरण – वह संकरण जिसमे F1 पीढ़ी का संकरण अप्रभावी लक्षण प्ररूप वाले जनक के साथ किया जात है उसे परीक्षण संकरण कहते है |
  11. संकरपूर्वज या पश्च संकरण – वह संकरण जिसमे F1 पीढ़ी का संकरण दोनों जनको में से किसी एक के साथ किया जाता है |

(2) पृथ्क्करण का नियम या युग्मको की शुद्धता का नियम – यह नियम मेंडल के एक संकर संकरण प्रयोता पर आधारित है | इस नियम के अनुसार F1 पीढ़ी के विषमयुग्मजी से युग्मक बनते समय दोनों युग्म विकल्पी एक दुसरे से प्रथक होकर अलग-अलग युग्मको में चले जाते है | अत: इसे पृथ्क्करण का नियम कहते है | तथा प्रत्येक युग्मक में एक लक्षण के लिए एक युग्म विकल्पी पाया जाता है | अत: इसे युग्मको की शुद्धता का नियम भी कहते है |

ऊदा- जब समयुग्मी पौधे लम्बे (TT) एंव समयुग्मी बौने (tt) पौधे में संकरण पाया जाता है तो F1 पीढ़ी में सभी पौधे विषमयुग्मजी लम्बे (Tt) प्राप्त होते है | विषमयुग्मजी में युग्मविकल्पी साथ साथ रहते हुए भी एक-दुसरे को संदुसित नहीं करते है | युग्मक बनते समय दोनों युग्म विकल्पी पृथक होकर अलग-अलग युग्मको में पहुच जाते है जिसके कारण F2 पीढ़ी में बौनेपन का लक्षण फिर से प्रकट हो जाता है |



Q. 5 एकसंकरण में F2पीढ़ी में लक्षण प्ररूप अनुपात व F2 पीढ़ी में जीन प्ररूप अनुपात लिखए ?

उत्तर- Fपीढ़ी में लक्षण प्ररूप अनुपात – 3:1

F2 पीढ़ी में जीन प्ररूप अनुपात- 1:2:1

संकर पूर्वज संकरण – जब Fपीढ़ी (Tt) के पौधों का संकरण दोनों जनको TT या tt में से किसी एक के साथ किया जाता है तो इसे संकर पूर्वज संकरण कहते है | यह संकरण दो प्रकार का होता है –

  • व्युत्पन्न संकरण – वह संकरण जिसमे ‘A’ पादप (TT) को नर व ‘B’ पादप को मादा जनक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है तथा दुसरे संकरण में ‘A’ पादप (tt) को मादा जनक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है तथा दुसरे संकरण में ‘A’ पादप (TT) को मादा व ‘B’ (tt) पादप को नर जनक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है उसे व्युत्पन्न पादप कहते है |
  • जनक पीढ़ी – संतति प्राप्त करने के लिए जिन पौधों के मध्य संकरण करवाया जाता है इसने जनक पीढ़ी कहते है |
  • F1 पीढ़ी – जनको के संकरण से प्राप्त प्रथम पीढ़ी को F1 पीढ़ी कहते है |
  • F2पीढ़ी – F1 पीढ़ी के संकरण से प्राप्त संतति को F2 पीढ़ी कहते है |
  • एकसंकर अनुपात- एक संकर से प्राप्त अनुपात को एक संकर अनुपात कहते है |

मेंडल के आनुवान्सिकता के नियम – 

1. प्रभानिता का नियम – इस नियम के अनुसार जब एक जोड़ी विपर्यासी लक्षणों वाले जनको में मध्य संकरण करवाया जाता है तो वह लक्षण जो पीढ़ी F1 में अपना लक्षण प्रकट करता है प्रभावी लक्षण कहलाते है | तथा वह लक्षण जो F1 पीढ़ी में प्रकट नहीं होता अप्रभावी लक्षण कहलाता है | इसे प्रभानिता का नियम कहते है |

उदा.- यदि समयुग्मजी लम्बे (TT) पौधे का समयुग्मी बौने (tt) पौधे से संकरण करवाया जाता है तो F1 पीढ़ी में सभी लम्बे प्राप्त होते है |



लम्बे                       बौने

TT                               tt       जनक पीढ़ी

T                                 t          युग्मक

Tt                            F1 पीढ़ी

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