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प्राचीन भारत की प्रमुख हस्तियां

प्राचीन भारत की प्रमुख हस्तियां

अजातशत्रु (493 ई.पु. 462 ई.पू.)




अजातशत्रु मगध नरेश बिम्बिसार का पुत्र व उत्तराधिकारी था जिसे कुणिक कहा जाता था | उसके अपने चचेरे भाई देवदत्त के उकसाने पर अपने पिता बिम्बिसार को कैद में दाल दिया तथा स्वयं गद्दी पर बैठ गया | सर्वप्रथम उसके कौशल नरेश प्रसेनजित से संघर्ष हुआ | अंतत: दोनों में समझौता हो गया तथा प्रसेनजीत ने अपनी पुत्री वजीर का विवाह अजातशत्रु से कर दिया | अपनी राजधानी राजगृह अथवा गिरिव्रज को द्रड किया | गौतम बुद्ध का निर्वाण उन्ही के शासन काल में हुआ | उसने 483 ई.पू. में राजगृह में सप्तपर्णी गुफा में प्रथम बौद्ध संगीति बुलाई |

अमरसिंह (तीसरी सदी)

ये प्राचीन भारत के एक महान विद्वान् एवं बौद्ध अनुयायी थे | विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे | उन्होंने अमरकोष नामक विख्यात कोष की रचना की जिसे नामलिंगानुशासन के नाम से पुकारा जाता है |

आम्रपाली

यह वैशाली की विख्यात गणिका थी जो वैशाली की नगर वधु के नाम से भी विख्यात थी | मगध के सम्राट अजातशत्रु के साथ इनके प्रेम किस्से भी प्रचलित है | बाद में बुद्ध की शिष्या बनी एवं उसने भिक्षु संघ के विकास हेतु अपनी आम्रवाटिका प्रदान की |

आनन्द

यह बौद्ध धर्म के प्रमुख भिक्षु तथा महात्मा बुद्ध का प्रिय शिष्य था | विभिन्न बौद्ध ग्रंथो में वुद्ध धर्म के सिद्धांतों तथा बुद्ध की शिक्षाओं का वर्णन बुद्ध एवं आनंद के मध्य वार्तालाप के रूप में दिया गया है | आनन्द के आग्रह पर ही महात्मा बुद्ध की मृत्यु के बाद आनंद राजगृह में हुई प्रथम बौद्ध संगीति में सम्मिलित हुए | तथा त्रिपिटक में से एक सुत्तपिटक का सम्पादन किया |

आर्यभट्ट-प्रथम

आर्यभट्ट भारत का एक प्रमुख गणितज्ञ तथा ज्योतिषी था | जिनका जन्म 476 ई. में पाटिलपुत्र में हुआ | उसने विख्यात ग्रन्थ आर्यभट्टियम की रचना की | उसके परिणाम प्राचीन भारतीय ज्योतिष एवं यूनानियों की ज्योतिष विद्या से स्वतंत्र थे | उसने बताया की वर्ष 365.2586805 दिनों होते है | दशगीतिक सूत्र तथा आर्यशितयत उसकी प्रमुख रचनाएं थी | उसने अंकगणित, ज्यामिति, बीजगणित तथा त्रिकोणमिति में भी अनेक नवीन आविष्कार किये | उसने पाई का बिलकुल सही मूल्य 3.1716 निकाली | अपने ग्रन्थ आर्यभट्टीयम में उसके शुन्य का प्रयोग किया है  तथा घनमूल निकालने की पद्दति का भी अविष्कार किया है |

असंग

यह ईसा की चौथी शताब्दी में गुप्तकाल के दौरान विख्यात बौद्ध पंडित तथा विख्यात वसुबंध का भाई था | ये महायान सम्प्रदाय की विज्ञानवाद अथवा योगाचार शाखा के प्रमुख व्याख्याकार थे | असंग एक महान विद्वान था | उसने योगाचार भुमिशास्त्र नामक महायान सम्प्रदाय का आधारभूत ग्रन्थ लिखा | महायान सम्परिग्रह तथा वज्रउद्देदिका टिका आदि उनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ थी |

बादरायन

ये ब्रह्मसूत्र के लेखक थे | सूत्र इतने स्वल्पाक्षर है की बिना भाष्य की सहायता से अनेक अर्थ लगाना कठिन है |

बाणभट्ट

बाणभट्ट कन्नौज के शासक हर्षवर्धन का दरबारी विद्वान था | बाण ने हर्षचरित नामक में हर्ष की जीवनी लिखी | कादम्बरी बाणभट्ट की विख्यात रचना है | इसका अधिकाँश भाग बाण ने तथा कुछ भाग बाण की मृत्यु के बाद उसके पुत्र पुलिंद ने लिखा |

भद्रबाहू
भद्रबाहू चन्द्रगुप्त मौर्य के समकालीन थे | चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में जब मगध में भयंकर अकाल पड़ा तो भद्रबाहू दक्षिण की और चले गये | उस समय मगध में रहे जैन संतो ने स्थूलभद्र के नेतृत्व में एक सभा कर वस्त्र धारण कर लिया | भद्रबाहू ने इन परिवर्तनों को मानने से इनकार कर दिया जिससे जैन धर्म का दो सम्प्रदायों में विभाजन हो गया | भद्रबाहु ने नेतृत्व में वस्त्र न पहनने वाले संत दिगम्बर तथा स्थूलभद्र ने नेतृत्व में वस्त्र पहनने वाले संत श्वेताम्बर खाहलाये | चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने अंतिम समय में भद्रबाहू  से जैन धर्म की दीक्षा ली तथा साथ दक्षिण में श्रवनबेलगोला चला गया |

भरत

ये प्राचीन भारत के महान विद्वान् थे | साहित्यशास्त्र अथवा काव्यशास्त्र के क्षेत्र में भारत ने ही सर्वप्रथम नाट्यशास्त्र ग्रन्थ की रचना द्वारा विविध अंगो पर प्रकाश डाला | इनको रस सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है | इसका सर सूत्र विभावानुभावव्यभिचारीसंयोगादरनिष्पति: बहुत विख्यात हिया | भरत के शास्त्र पर अनेक विद्वानों ने टीकाएँ लिखी है  जिनमे अभिनवगुप्त द्वारा लिखी अभिनवभारती टीका प्रमुख है |

भारवि

भारवि एक महान संस्कृत कवि थे जो कालिदास के समकालीन थे | इनकी सर्वाधिक विख्यात रचना किरातार्जुनीयम नामक महाकाव्य हिया जिसके अंतर्गत अर्जुन अथवा किरात केशवधारी शिव के बीच युद्ध का वर्णन मिलता है | भारवि ने केवल एक अक्षर ‘न’ वाला श्लोक में अपनी काव्य कुशलता का परिचय दिया है |

भास

भास को संस्कृत का प्राचीनतम नाटककार माना जाता है | वे लौकिक संस्कृत के प्रथम साहित्यकार थे | गणितज्ञय शास्त्री ने 1909 ई. में भास के 13 नाटकों – प्रतिमा, अभिषेक, पंचरात्र, मध्य व्यायोम, दूत घटोत्कच, कर्णधार, दूतवाक्य, उरुभंग, दरिद्रचारुदत्त, अविमारक, प्रतिज्ञायौगन्धारायण तथा स्वप्नवासवदता की खोज की |

भास्कराचार्य-1 (छटी सदी पूर्व )

ये प्राचीन भारत के ज्योतिषाचार्य के प्रमुख ज्ञाताओ में थे | इन्होने ज्योतिष तथा फलित ज्योतिष पर कई ग्रंथो की रचना की थी | यथा- म्हाभास्करीय तथा लघुभास्करीय |

भास्कराचार्य

ये विख्यात गणितज्ञ तथा ज्योतिशाचार्य थे जिनका जन्म 1114 ई. में बीजापुर में हुआ था | उसके पिता चूड़ामणि महेश्वर भी ज्योतिषी, खगोलशास्त्री तथा गणितज्ञ थे | भास्कराचार्य ने यह प्रतिपादित किया की पृथ्वी गोल है | उन्होंने आकर्षण शक्ति के सिद्दान्त को भली-भांति प्रतिपादित किया |



भटिट्

वल्लभी निवासी भटिट् छटी शताब्दी का पूर्वार्द्ध माना जाता है | इनके ग्रंथो में रावण वध अथवा भट्टीकाव्यम महत्वपूर्ण है | इस ग्रन्थ का कथानक रामायण से लिया गया है |

भवभूति

संस्कृत साहित्य के इतिहास में भवभूति कालिदास के स्तर के नाटककार थे | वे कन्नौज नरेश यशोवर्मन के दरबारी विद्वान थे | इसके लिखे हुए तीन नाटक विख्यात है – मालतीमाधव, महावीररचित तथा उत्तर रामचरितम | कालिदास के लेकर भवभूति तक का समय नाट्य साहित्य के विकास का स्वर्णयुग माना जाता है |

भेल

ये प्राचीन भारत के आयुर्वेद विद्वानों में महत्वपूर्ण स्थान रखते है | ये आचार्य पुनर्वसु के प्रमुख शिष्य थे | विभिन्न रोगों तथा आयुर्वेदिक उपचारों के सम्बन्ध में उन्होंने एक ग्रन्थ की रचना की जो भेल संहिता के नाम से विख्यात है |

बिज्जिका

ये गुप्तकालीन विद्वान् थे जिन्होंने कई नाटको की रचना की , जिनमे कौमुदी महोत्सव प्रमुख है | यह नाटक चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा साम्राज्य की स्थापना पर प्रकाश डालता है |

बिम्बिसार (544-493 ई.पू.)

बिम्बिसार मगध के प्रथम शासक था तथा मगध का उत्थान उसके समय से ही प्रारम्भ होता है || वह 544 ई. में गद्दी पर बैठा तथा विवाह सम्बन्धो से  अपनी स्थिति को द्रड बनाया | उसने कौशल नरेश प्रसेनजित की बहन कौशल देवी से विवाह किया जिससे उसे दहेज में काशी मिला | उसने लिच्छिवी नरेश चेतक की पुत्री चेलना के साथ भी विवाह किया |ण इसके अलावा उसने मद्र राजकुमारी खेमा तथा विदेह राजकुमारी बासवी के साथ विवाह किया | उसने अंग के राजा बृहद्रत पर आक्रमण कर उसे परास्त किया तथा मगध में मिला लिया | उसने राजगृह कको अपनी राजधानी बनाया तथा अनेक जनकल्याणकारी कार्य करवाए | विख्यात वैध जीवक उसी के दरबार में रहता था |

बिन्दुसार (298-273 ई.पू.)

मौर्य वंश का द्वितीय शासक बिन्दुसार (अमित्रघात) चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र अशोक का पिता था | स्त्रैवो ने उसे अलिट्रोकेड्स कहा है | उसने अपने समय में तक्षशिला में हुए दो विद्रोहों का दमन करने के लिए अपने पुत्रों- अशोक तथा सुसीम को क्रमश: भेजा | उसके दरबार में डाइमेकस नामक यूनानी राजदूत था | जो यूनानी शासक एन्टीओकस का प्रतिनिधि था | दश्र्की भेजनें को कहा किन्तु यूनानी राजा ने परम्परा विरुद्ध होने के कारण दार्शनिक को मौर्य दरबार में नहीं भेजा | डायोनीसियस मौर्य दरबार में मिश्र का दूत था |

ब्रह्मगुप्त (598-580 ई.)

ब्रह्मगुप्त गुप्तकाल का विख्यात ज्योतिषी व गणितज्ञ था | इसका जन्म 598 ई. में उज्जयनी में हुआ | उसके ब्रह्मसिद्दान्त नामक ग्रन्थ की रचना की जिसमे न्यूटन से ही पृथ्वी से सदियों पूर्व सिद्ध कर दिया की , सभी वस्तुएं अपनी प्रकृति से ही पृथ्वी की और गिरती है | तथा पृथ्वी सभ वस्तुओं को अपनी और आकर्षित करती है | उसने आर्यभट्ट , श्रीसेन, विष्णुचन्द्र, लाट तथा प्रधुम्य के सिद्दांतों तथा प्रणालियो की भी आलोचन की | उसने वेदांग के पांचवर्षीय युग तथा जैन विचारधारा के उन सिद्दांतो की आलोचना की जिनमे दो सूर्य, दो चन्द्र तथा दोहरे नक्षत्रो का प्रतिपादन किया था |

चन्द्रबेलब्बा
प्राचीन भारत की नारी प्रशासिकाओं में चन्द्रबेलब्बा का महत्वपूर्ण स्थान है | वह राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष प्रथम (814-78 ई.) की पुत्री थी | अमोघवर्ष के समय का 837 ई. का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है जिससे पता चलता है की उस समय चन्द्रबेलब्बा रायचूर दोआब के प्राप्तपति के रूप में शासन कर रही थी |

चन्द्रगुप्त- प्रथम (319-335 ई.)

यह गुप्त वंश का प्रथम शासक था एवं गुप्त वंश का इतिहास वास्तविक अर्थ में उसी के साथ प्रारम्भ होता है | उसने लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी के साथ विवाह किया तथा लिच्छवियों के सहयोग से उसने पाटिलपुत्र पर अधिकार कर उसे अपनी राजधानी बनाया | वह महाराजाधिराज की उपाधि ग्रहण करने वाला प्रथम गुप्त शासक था | उसने जो स्वर्न्म के सिक्के जारी किए, उन पर कुमारदेवी का भी चित्र अंकित किया | उसने गद्दी पर बैठने पर एक नया संवत गुप्त संवंत चलाया जो 26 फरवरी 320 ई. से प्रारम्भ माना जाता है |

चन्द्रगुप्त मौर्य (322-298 ई.)

चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरु विष्णुदत्त अथवा कौटिल्य की सहायता से अंतिम नदं नरेश घनानन्द को परास्त कर नंद वंश के स्थान पर मौर्य वंश का शासन स्थापित किया | विशाखादत्त कृत मुद्राराक्षस में इसे वृषल व कुलहीन कहा गया है तथा यूनानी लेखकों ने उसे सैंड्रोकोटस तथा एन्ड्रोकोटस के नाम से पुकारा है | ब्राहमण ग्रन्थों में उसे शुद्र तथा जैन व बौद्ध ग्रंथो में क्षत्रिय कहा गया है | वह मगध पर विजय प्राप्त कर सम्राट बना | उसने 305 ई.पु. में यूनानी शासक सेल्यूकस को परास्त कर काबुल, कांधार, हेरात व बलूचिस्तान के प्रदेश प्रप्त किये तथा उसकी अपनी पुत्री हेलेना के साथ विवाह किया | एक यूनानी राजदूत मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया, जिसने इंडिका ग्रन्थ की रचना की | अंतत: श्रवनबेलगोला में स्थित चन्द्रगिरी पहाड़ी पर 298 ई. में उपवास के द्वारा अपना शरीर त्याग दिया |

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (380-414 ई.)

यह समुद्रगुप्त का पुत्र था | उसने देवराज, देवगुप्त, विक्रमादित्य आदि उपाधियाँ ग्रहण की | उसने नागवंशीय राजकुमारी कुबेरनागा तथा कदम्ब नरेश काकुस्थवर्मन की पुत्री से विवाह किया | उसने अनेक विजये प्राप्त की | उसने वाकाटक राजकुमार रुद्रसेन दितीय के साथ अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह किया | उसने वाकाटकों के सहयोग के शक शासक रुद्रसिंह तृतीय को परास्त कर भारत से शको का उन्मूलन कर दिया तथा शाकारी की उपाधि ग्रहण की तथा चांदी के सिक्के चलाए | उसने अश्वमेघ यज्ञ किया | वह वैष्णव धर्म का अनुयायी था उसने कला और साहित्य को संरक्षण दिया | विख्यात कवि व नाटककार कालिदास संभवत: उसी के दरबार में रहता था | चीनी यात्री फाइयान भी उसी के शासनकाल में भारत आया था |


चन्द्रगोमी

प्राचीन भारत में व्याकरण आचार्यो में चन्द्रगोमी (5वीं सदी ) का महत्वपूर्ण स्थान है | ये बौद्ध धर्मावलम्बी थे जिन्होंने चांद्र व्याकरण की रचना की थी |

चार्वाक

चार्वाक तीसरी सदी का एक महान दार्शनिक तथा लोकायत सिद्दान्त का प्रतिपादक था | व भौतिकवादी विचारधारा का प्रमुख व्याख्याकार था  उसने विश्ववाद, आत्मा तथा ईश्वर की धारणा को अस्वीकार कर दिया | उसके अनुसार शरीर तथा जगत चार तत्वों-वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी की समष्टि एक अतिरिक्त कुछ भी नहीं है  उसका वेद, पुनर्जन्म. स्वर्ग, नरक आदि धारणाओ एम् विश्वास नहीं था  वस्तुत: चार्वाक दर्शन धार्मिक आडम्बरों के विरुद्ध भौतिकवादी आन्दोलन था |

चारुमती

यह महान मौर्य सम्राट अशोक की पुत्री थी जिसका विवाह देवपाल क्षत्रिय से किया गया था, किन्तु बाद में उसने सन्यास ले लिया, स्वयं एक बौद्द भिक्षुणी बन गई | 250 ई. पू. जब अशोक नेपाल की यात्रा पर गया, तो यह भी अपने पिता के साथ गई थी  इसने नेपाल में अपने पति देवपाल के ना पर देवपाटन नगर की स्थापना की थी | उसने पशुपतिनाथ मंदिर के समीप एक विहार का निर्माण करवाया |

चारुमती

यह किशनगढ़ के राजपूत शासक की बहन थी | जिसका विवाह औरंगजेब के साथ तय हुआ था किन्तु वह मेवाड़ नरेश राजसिंह के साथ विवाह करना चाहती थी |

हाल

यह सातवाहन वंश का शासक था, जो 20-24 ई. में हुआ था | उसके शासन के सम्बन्ध में काव्यमीमांसा, लीलावती, अभिधान चिंतामणि तथा गाथा सप्तशती में जानकारी मिलती है | वह एक महान कवि तथा साहित्यकार था जिसने गाथा सप्तशती नामक ग्रन्थ की रचना की |

हर्षवर्धन (606-648 ई.)

पुष्यभूति वंश तथा उत्तर भारत का अंतिम महान हिन्दू शासक हर्षवर्धन का था | राज्यश्री ने पुत्रविहीन होने के कारण कन्नौज का शासन हर्ष को सौप दिया तथा हर्ष ने थानेश्वर के स्थान पर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया | उसने शासन के आरम्भिक वर्षो में पंचप्रदेशों (पंजाब, बन्नौज, बंगाल, बिहार व उड़ीसा) पर विजय प्राप्त की | उसने बल्लभी नरेश ध्रुवसेन को परास्त कर अपनी अधीन किया, किन्तु बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन दितीय के हाथो पराजित हुआ | उसने चीनी सम्राट के दरबार में दूत भेजे | उसने न्याय व्यवस्था को कड़ा बनाया तथा सैन्य प्रबंध में सुधार किए | उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था | चीनी यात्री हेन्सांग की अध्यक्षता में (कन्नौज की सभा (642ई.) बुलाई थी | वह हर पांचवे वर्ष प्रयाग में सभा बुलाकर खुलकर दान करता था | उसने रत्नावली, प्रियदर्शिका व नागानंद नामक तीन ग्रन्थ लिखे  उसके दरबार में बाणभट्ट, जयसेन, दिवाकर, मयूर जैसे विद्वान थे |

जमालि

यह के क्षत्रिय सरदार था जिसका विवाह प्रियदर्शिका (जैन धर्म के अंतिम तीर्थकर महावीर स्वामी की पुत्री) के साथ हुआ | कालांतर में महावीर स्वामी से प्रभावित होकर जमालि ने भी जैन धर्म स्वीकार कर लिया तथा साधू बन गया | उसका क्रियामाणकृत सिद्दान्त पर महावीर में मतभेद था | जमालि महावीर का प्रथम शिष्य था |

जीवक

यह प्राचीन भारत का एक महान वैध तथा चिकित्साशास्त्री था जिसने तक्षशिला विश्वविधालय में शिक्षा प्राप्त की थी  तथा आयुर्विज्ञान की शिक्षा हेतु विख्यात हुए | तत्पश्चात वह विम्बिसार ले दरबार में राजवैध बना |

कालाशोक

शिशु नाग की मृत्यु के पाश्चात उसका पुत्र अशोक मगध का शासक बना | वह इतिहास में काकवर्ण या कालाशोक के नाम से प्रसिद्ध है | उसने पुन: पाटलिपुत्र को मगध की राजधानी बनाया | उसके शासनकाल में दितीय बौद्ध संगीति (जो महात्मा बुद्ध के निर्वाण के सौ वर्षो के बाद ) वैशाली में हुई थी |

कल्हण

प्राचीन भारत के महान लेखक कल्हण के पिता लोहार वंश के शासक हर्ष के दरबार में ऊँचे पद पर थे | उसने अपने विख्यात ग्रन्थ राजतरंगिणि की रचना अंतिम लाहोर शासक जयसिंह के समय की जसमे कश्मीर के इतिहास का वर्णन मिलता है |

कालिदास

ये गुप्तकालीन संस्कृत भाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि तथा नाटककार थे | संभवत: ये विक्रमादित्य की राजधानी उज्जयिनी में रहते थे तथा शैव मतावलम्बी थे  उन्होंने अनेक काव्य ग्रन्थों की रचना की जिसमे ऋतुसंहार, मेघदूत, कुमारसम्भव, रघुवंश, विक्रमोवर्शीयम, मालविकाग्निमित्र तथा अभिज्ञानशाकुन्तलम आदि प्रमुख है | यधपि कालिदास के सभी ग्रन्थ श्रेष्ठ है तथापि अभिज्ञानशाकुन्तलम उनमे से श्रेष्ठ है | वे श्रृंगार रस के सिद्ध कवि थे | कालिदास को भारत का शेक्सपीयर भी कहा जाता है |

कणाद

ये प्राचीन भारत के माह दार्शनिक थे जिन्हें कणभूक, उलूक तथा काश्यप आदि नामो से पुकारा जाता था | इन्होने वैशेषिक दर्शन का प्रतिपादन किया | उनके द्वरा रचित वैशेषिक सूत्र इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है जिस पर प्रशस्तपाद ने पदार्थ धर्मसंग्रह के नाम से टीका लिखी |

इन्होने परमाणुवाद का सिद्दान्त प्रतिपादित किया जिसके अनुसार संसार के सभी कार्य द्रव्यों का निर्माण चार प्रकार के परमाणुओं-पृथ्वी, जल, तेज तथा वायु से होता है | ये परमाणु निष्क्रिय होते है तथा इन्हें गति ईश्वर द्वारा प्रदाम की जाती है |

कनिष्क

ये कुषाण वंश के सर्वश्रेष्ठ शासक थे | श्री धर्मपिटक निदान सूत्र के अनुसार उसने पाटिलपुत्र पर विजय प्राप्त कर वहां से बुद्ध का भिक्षा पात्र तथा अश्वघोष नामक बौद्ध भिक्षु प्राप्त किया | तिब्बती ग्रंथो में उसके साकेत विजय, चीनी ग्रंथो में दक्षिण भारत विजय का उल्लेख है | उसका साम्राज्य गंगा, सिंधु तथा औक्सस की घाटियों तक विस्तृत था  उसकी दो राजधानियां – पुरुषपुर (पेशावर) तथा मथुरा थी | उसने कश्मीर में कनिष्कपुर नामक नगर की स्थापना की | उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिए | उसके समय में कश्मीर में कुंडलवन में वसुमित्र की अध्यक्षता में चतुर्थ बौद्ध संगीति काआयोजन किया गया तथा बौद्ध धर्म दो सम्प्रदाय हीनयान तथा महायान भागो में बंट गया | उसके सिक्को पर सभी प्रकार के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ मिलती है | वह विद्वानों का आश्रयदाता था  उसके दरबार में अश्वघोष, नागार्जुन, वसुमित्र तथा चरक जैसे विद्वान थे  उसने सोने के सिक्के रोमन सिक्कों के समान प्रतीत होते है |

कपिल

ये प्राचीन भारत ऋषि तथा दार्शिनिक थे | जिन्होंने सम्प्रदाय सांख्य दर्शन का प्रतिपादन किया | कपिल ने द्वैतवादी विचारधारा का प्रतिपादन करते हुए पुरुष एवं प्रकृति की स्वतंत्रता सत्ता को स्वीकार किया है | उन्होंने मोक्ष की धारणा पर बल दिया तथा उसे सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति पाने का साधन माना |

कात्यायन

ये महान व्याकरणाचार्य थे  जिनका जन्म पांचवी शताव्दी ई.पू,के लगभग माना जाता है इन्होने पाणिनि के अष्टाध्यायी पर विद्वतापूर्ण वार्तिको की रचना की |

कौटिल्य/विष्णुगुप्त/चाणक्य

वह मौर्य वंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य का गुरु तथा प्रधानमंत्री था | उसने तकक्षिला विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था तथा तत्पश्चात वही अध्यापन करने लगा | अंतिम नन्द शासक धनानंद के अपनाम से चिडकर कौटिल्य ने नन्द वंश के विनाश की प्रतिज्ञा की तथा उसके निर्देशन में चन्द्रगुप्त मौर्य तथा फिर सम्भवत: उसके पुत्र बिन्दुसार का प्रधानमंत्री रहा | भारतीय इतिहास में उसकी ख्याति एक राजनीतिज्ञय के रूप में है | इसमें कौटिल्य के राजा के कर्तव्य, युद्ध के ढंग, कूटनीति के विषय तथा शासन प्रबन्धन को श्रेष्ठ बनाने के नियमों का विवरण दिया है |

कौण्डिन्य

कौण्डिन्य नामक ब्राहमण ने प्रथम सदी ई.पू. में कंबोडिया में फूनान नामक राज्य की स्थापना की तथा वहां से असभ्य लोगो को सभ्य बनाया |

लकुलीश

लकुलीश ने शिव की पूजा को पाशुपत सम्प्रदाय ने संगठित किया | पश्चिम में कायवरोहण नामक स्थान पर लकुलीश का जन्म हुआ | जिन्हें शिव के 28वें तथा अंतिम अवतार थे | लकुलीश के विचारों का माधवाचार्य ने सर्व दर्शन संग्रह में वर्णन किया है | इसके अनुसार लकुलीश शिव को पति कहते थे तथा उन्हें सृष्टि का रचियता मानते थे |

लीलावती

यह भास्कराचार्य की पुत्री थी तथा गणित की बहुत बड़ी ज्ञाता थी | इसने अंकन पद्दति, भिन्न, व्यावसायिक नियम, पूर्णाक, ब्याज तथा क्रम द्वारा प्रतिपादित नियमों का लीलावती नामक ग्रन्थ में संग्रह किया | अकबर के समय में इस ग्रन्थ का फैजी के द्वारा अनुवाद किया गया था |



लोपामुद्रा

यह प्राचीन भारत (ऋग्वैदिककालीन) विदुषी नारियों में एक थी तथा उसने ऋग्वेद में अनेक सूक्तों की रचना की | उसका विवाह ऋषि अगस्त्य से हुआ जिन्होंने दक्षिण का प्रयोग बड़ी कुशलता से किया है |

माघ

ये संस्कृत के श्रेष्ठ कवियों में थे जिनका काल 675 ई. के समीप माना जाता है | इन्होने शिशुपाल वध नामक विख्यात ग्रन्थ लिखा | उन्होंने अपने पदों में अलंकारों का प्रयोग बड़ी कुशलता से किया है |

महेन्द्र

ये मौर्य सम्राट अशोक अक पुत्र था | यधपि अशोक ने किसी अभिलेख में इसकी पुष्टि नहीं की है तथापि दीपवंश, महावंश एवं अन्य सिंहली ग्रंथो से इसका उल्लेख प्राप्त होता है | उसने लंका का शासक तिस्स, उसकी रानी तथा वहाँ के लोगो को बड़ी संख्या में बौद्ध बनाने में सफलता प्राप्त की | उसने वहाँ बोधिवृक्ष की एक शाखा, जिसे वह भारत लेकर आया था, वहाँ रोपित की, जो आज भी विशाल वृक्ष के रूप में विद्यमान है |

महामाया

महात्मा बुद्ध की माता महामाया अथवा मायादेवी कोलीय वंश की क्षत्रिय राजकुमारी थी उसके विवाह कपिलवस्तु के शाक्य शासक शुद्दोधन के साथ हुआ | बुद्ध के जन्म के एक सप्ताह बाद महामाया की मृत्यु हो गई | अत: सिद्दार्थ का पालन उनकी छोटी बहन प्रजापति गौतमी ने किया |

महावीर स्वामी (599-527ई.)

ये जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर महावीर का जन्म 599 ई. पूर्व बिहार  में वैशाली के समीप कुंडग्राम में हुआ था | उनकी माता का नाम त्रिशला तथा पिता का नाम सिद्दार्थ था जो वज्जी संघ के अंतर्गत ज्ञात्रक नाम क्षत्रिय कबीले के मुखिया थे | राजपुत्र होने तथा समस्त सुख-सुविधाओं के बावजूद महावीर का झुकाव आरम्भ से ही वैराग्य की और था | उनका विवाह यशोदा के साथ हुआ जिससे उनके प्रियदर्शना नामक पुत्री हुई | अपने माता-पिता की मृत्यु के पश्चात महावीर ने सन्यास ले लिया तथा 12 वर्ष तक कठोर तपस्या की | अन्तत: वैशाख मास की दशमी के दिन ऋजुपालिका नदी के तट पर उन्होंने ज्ञात (केवलव्य) प्राप्त किया | तब वे जिन कहलाये तथा निग्रन्थ कहलाये | तत्पश्चात उन्होंने चम्पा, मिथिला, श्रावस्ती, विदेह आदि स्थानों पर विचारों का प्रचार किया |72 वर्ष की आयु में 527 ई.पू. में पावापुरी में महावीर ने मोक्ष प्राप्त किया | उन्होंने त्रिरत्नो (सम्यकज्ञान, सम्यक दर्शन तथा सम्यक चरित्र) तथा पंच महाव्रतो (सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य का व्रत महावीर ने जोड़ा) के पालन पर बल दिया | वे कृम एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे | वे नास्तिक थे तथा अनीश्वरवाद के समर्थक थे | उन्होंने स्यातवाद या अनेकान्तवाद का सिद्धांत का प्रतिपादन किया |

मंडन मिश्र

ये मीमांसा दर्शन के प्रमुख आचार्य थे तथा शंकराचार्य के समकालीन थे | इन्होने अनेक दार्शनिक ग्रंथो विधि विवेक, भावना विवेक, विभ्रम विवेक तथा मीमांसा सूत्रानक्रमण आदि की रचना की | इसके अतिरिक्त ब्रह्मसिद्दी तथा स्फोट आदि ग्रंथो की रचना भी उन्होंने ही की थी | उन्हें शास्त्रार्थ में शंकराचार्य से परास्त होना पड़ा |

मनु

ये विख्यात हिन्दू ऋषि तथा तथा धर्मशास्त्रवेत्ता थे जिन्हें मानव जाति के जनक तथा प्रथम विधिवेत्ता के रूप में वर्णित किया गया है | उनका ग्रन्थ स्मुस्मृति सबसे प्राचीन तथा हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है | इसमें हिन्दुओ के सामाजिक तथा धार्मिक नियमों का वर्णन किया गया है |



मैत्रेयनाथ

यह (तीसरी सदी) का एक महान दार्शनिक था | यह महायान धर्म का उपासक था तथा इसने विज्ञानवाद (योगाचार) नामक शाखा की स्थापना की | इस मत में जगत की समस्त वस्तुओं को विज्ञान माना गया है |

मैगस्थनीज (302-298 ई.पू.)

मौर्यकालीन इतिहास जानने का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत मैग्स्थनीज द्वारा लिखी गई इंडिका है | मैगस्थंनीज यूनानी था जिसे यूनान के शासक सेल्यूकस ने अपना दूत बनाकर चन्द्रगुप्त मौर्य दरबार में भेजा था | वह 302 ई. से 298 ई. तक मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलीपुत्र में रहा |

मेघा तिथि

यह महान हिन्दू स्मृतिकार था जिसने मनुस्मृति पर टीका लिखी जो काफी प्रमाणिक टीका मानी जाती है जिसमें सामजिक नियमों का विवेचन किया गया है तथा विभिन्न धार्मिक रीतियों पर प्रकाश डाला है |

मोगलिपुत्त तिस्स

यह अशोक अक समकालीन बौद्ध भिक्षु था | अशोक का बौद्ध बनाने का श्रेय मोगलिपुत्र (सिंहली ग्रंथो के अनुसार) दिया जाता है | इन्होने अशोक के शासन काल में पाटलिपुत्र में 251 ई.पू. में बुलाई गई तृतीय बौद्ध संगीति की अध्यक्षता की थी | मोगलीपुत्त ने महासान्धिक विचारों का खंडन करते हुए अपने सिद्धांतो को बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांत  के रूप में प्रतिपादित किया | उन्होंने कथावस्तु नामक ग्रन्थ संकलित किया जो अभिधम्म पिटक का ही एक भाग है |

नागार्जुन

यह कनिष्क के समय का विख्यात विद्वान था जो उच्चकोटि का दार्शनिक था | किन्तु कालांतर में बौद्ध धर्म हो गया | वह पहला विद्वान था जिसने की महायान धर्म के विषय में लिखा | उसने बौद्ध दर्शन के इतिहास में एक नये युग का प्रारम्भ किया तथा उसने निश्चित रूप प्रदान किया | इसने महायान शाखा का प्रचार किया तथा कई विख्यात ग्रंथो माध्यमिक सूत्र तथा प्रजनापरामित्र सूत्र की रचना की | शून्यवाद के सिद्धांत का प्रतिपादन भी इसी विद्वान ने किया था | उसकी अन्य दो प्रसिद्ध कृतियाँ सुह्ल्लेख तथा मध्यमकारिका है |

नागसेन

यह के विख्यात बौद्ध भिक्षु था जो यूनानी शासक मिनांडर का समकालीन था | वह बौद्ध साहित्य में मिलिन्दपन्हो नामक ग्रन्थ की रचना के लिए विख्यात है , जो पाली भाषा में रचा गया | नागसेन से मिलिन्द (मिनांडर) ने धर्म के विषय में जो प्रश्न पूछे थे उनका संकलन भी इस ग्रन्थ में किया गया है | नागसेन के उत्तरों तथा उपदेशो से प्रभावित होकर मिनांडर ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था |

नागनिका

यह सातवाहन वंश के शासक शातकर्णी प्रथम की पत्नी थी | इसका काल प्रथम सदी ई.था | यह के शिक्षित महिला थी तथा इसने अपने पति के साथ अश्वमेघ यज्ञ में भाग लिया | इसने नानाघाट अभिलेख उत्कीर्ण करवाया जिसमे शातकर्णी की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया है |

पाणिनि

यह प्राचीन भारत के महान व्याकरणाचार्य थे तथा संस्कृत का प्रादुर्भाव इनसे माना जाता है | इनका कला पांचवी सदी ई.पू, के लगभग माना जा सकता है | इनकी महत्वपूर्ण कृति शब्दानुशासन अथवा अष्टाध्यायी है | इनके व्याकरण की प्रमुख विशेषताओं में वाक्यों में पदों का संकलन पदों की प्रकृति प्रत्यय विभाग तथा पदों की रचना संधि आदि है | पातालविजय तथा ताम्बवतीपरिणय नामक ग्रंथो का रचियता भी पाणिनि ही माना जाता है |

पार्श्वनाथ

ये जैन धर्म के 23वें तीर्थकर थे तथा ऐतिहासिक पुरुष थे, जो महावीर स्वामी से 250 वर्ष पूर्व पैदा हुए | वे बनारस के राजा अश्वसेन तथा वामा के पुत्र थे | 30 वर्ष की आयु तक इन्होने गृहस्थी की तरह जीवन व्यतीत किया | इसके बाद राजकीय सुख-समृद्धि छोड़कर साधू बन गये | उन्होंने सम्मेद पर्वत पर 83 दिन कठोर तपस्या के बड धर्म प्रचार का कार्य किया | अहिंसा, सत्य, अस्तेय व अपरिग्रह का पालन करने का उपदेश दिया |

पारमार्थ (499-569ई.)

यह विख्यात बौद्ध भिक्षु था जिसने कई ग्रंथो की रचना की जिनमे वसुबन्धुचरित सबसे विख्यात है |

पतंजलि

पतंजली (दसूरी शताब्दी ई.पू.) के महान व्याकरणचार्य थे जिन्हें शेषनाग का अवतार भी कहा जाता है | पाणिनि पतंजली तथा कात्यायन को सम्मिलित रूप से त्रिमुनी कहा जाता है  उन्होंने महाभाष्य की रचना को जो व्याकरण का अमर ग्रन्थ हिया  इन्होने मगध के राजा पुष्यमित्र शंगु के समय अश्वमेघ यज्ञ करवाया था |

प्रजापति गौतमी

यह कोलीय वंश की क्षत्रिय राजकुमारी थी तथा सिद्धार्थ (बुद्ध) की मौसी थी | अत: शुद्धोधन ने प्रजापति गौतमी के साथ विवाह कर लिया जिसने सिद्धार्थ का पालन पोषण भी किया | बाद में सिद्धार्थ (बुद्ध) उपदेशो से प्रभावित होकर प्रजापति गौतमी बौद्ध भिक्षुणी बन गई |

पुष्यमित्र शंगु

यह मौर्य सम्राट बृहद्रत का ब्राहमण सेनापति था  इसने 184 ई.पू. में मौर्य शासक बृहद्रत की हत्या कर दी शुंग वंश की स्थापना की |

राहुल

यह बौद्ध धर्म से संस्थापक गौत्तम बुद्ध का पुत्र था को कोलीय वंश की राजकुमारी यशोधरा से उत्पन्न हुआ | इसके जन्म पर सिद्धार्थ (बुद्ध) ने कहा था की एक और बंधन उत्पन्न हो गया | उसके पिता के सान्निध्य में धर्म की दीक्षा ले ली तथा जीवनं भर बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया |

समुद्रगुप्त (335-375ई.)

यह के प्रमुख गुप्त शासक था | जो पिता की मृत्यु के बाद 335 ई. में गद्दी पर बैठा | प्रयास प्रशस्ति में उसे अच्छा कवि तथा विद्वानों का संरक्षक भी बताया है | वह अच्छा संगीतज्ञ भी माना गया है  उसके कुछ वीणा बजाते हुए सिक्के भी प्राप्त हुए है |

संघमित्रा

यह मौर्य सम्राट अशोक की पुत्री थी | उसने शीघ्र ही बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली तथा लंका नरेश तिस्स के निमन्त्रण पर वह अपने भाई महेंद्र के साथ पाटलिपुत्र बंदरगाह से लंका की और रवाना हुई  उसने अपने उपदेशों द्वारा लंका में बौद्ध धर्म का बड़ा प्रचार किया |

शंकराचार्य (788-820 ई.)

शंकराचार्य दक्षिण भारत में भक्ति आन्दोलन के प्रथम प्रवर्तक थे जिनका जन्म 788 ई. में मालाबार में काल्दी नामक स्थान पर एक ब्राहमण परिवार में हुआ | वे वेदों और उपनिषदों के प्रकांड पंडित थे | उन्होंने जैन तथा बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त कर हिन्दू धर्म में श्रेष्ठता स्थापित की तथा अद्वैतवाद दर्शन का प्रतिपादन किया | उसके अनुसार ब्रम्ह तथा जगत एक ही है | उन्होंने पूर्व में जगन्नाथपुरी, पश्चिम में द्वारिका, उत्तर में बद्रीनाथ एवं दक्षिण में श्रृंगेरी मठ की स्थापना की |

शिशुनाग

शिशुनाग वंश का संस्थापक शिशुनाग बड़ा ही वीर तथा पराक्रमी व्यक्ति था | उसने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र के स्थान पर राजगृह को बनाया तथा वैशाली को मगध साम्राज्य की दूसरी राजधानी बनाया |

शुद्दोदन

यह कपिलवस्तु के शाक्य गणराज्य का शासक था | उनका विवाह कोलीय वंश की क्षत्रिय राजकुमारी महामाया के साथ हुआ जिससे उन्हें सिद्धार्थ नामक पुत्र की प्राप्ति हुई जो आगे चलकर बुद्ध के नाम से विख्यात हुआ | अपने पुत्र के उपदेश सुनकर शुद्दोदन ने भी बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली तथा एक भिक्षु के रूप में बौद्ध धर्म का प्रचार किया |

शूद्रक

प्राचीन भारत के (गुप्तकालीन) नाटककारों में शूद्रक का महत्वपूर्ण स्थान है | उन्होंने कुछ नाटकों की रचना की जिसमे मृच्छकटीक्म एक विख्यात कृति है  यह प्रथम सामजिक नाटक है जिसमेराजपरिवार के स्थान पर जनसाधारण को नाटक का पात्र बनाया गया है |

सिद्धार्थ

ये जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर महावीर स्वामी के पिता तथा वज्जि राज्य के संघ के अंतर्गत ज्ञात्रक नामक क्षत्रिय कुल के मुखिया थे जिसकी राजधानी कुण्डग्राम थी | इनका विवाह लिच्छवी वंश की विख्यात राजा चेटक की बहिन त्रिशला के साथ हुआ था | त्रिशला से कालान्तर में एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम वर्द्धमान (महावीर) रखा गया |
सोमदेव

प्राचीन काल में कश्मीरी शासक अनन्त के दरबार में नियुक्त थे | इन्होने कथासरित्सागर नामक ग्रन्थ की रचना की जो गुणाड्य द्वारा रचित वृहत्कथा का संस्कृत अनुवाद है |

सुदास

यह एक शासक था जिसका उल्लेख ऋग्वेद में आता है | यह भरत जन कबीले का वीर शासक था जिसका उद्देश्य दशराज युद्ध के प्रसंग में आता है, जो परुष्णी (रावी) नदी के तट पट लड़ा गया | इसमें सुदास विजयी रहा |

सुश्रुत (दितीय शताब्दी)

यह आयुर्वेद के एक महान चिकित्सक माने जाते है  आयुर्वेद की परम्परा के अनुसार माना गया है की कायचिकित्सा में चरक प्रमाणिक है तो शल्य में सुश्रुत है | उन्होंने शुश्रुतसंहिता नामक ग्रन्थ की रचना की | इन्होने शल्य चिकित्सा में 121 उपकरणों का उल्लेख किया है | इन्हें प्लास्टिक सर्जरी का जनक माना जाता है |

उद्योतन सूरी

प्राचीन भारत के जैन लेखकों में से एक उद्योतन सूरी ने कुवलयमाता नामक कथा की रचना 779 ई. में की | यह एक चम्पू काव्य है तथा इसे प्राकृत भाषा में लिखा गया है |

उपालि

बुद्ध का प्रमुख शिष्य उपालि साधना तथा श्रद्धा से बुद्ध का प्रिय शिष्य बना गया था || उसने बुद्ध की मृत्यु के पश्चात राजगृह में होने वाली प्रथम बौद्ध संगीति में भाग लिया था तथा बुद्ध के समस्त सिद्धांतो का दोहरान किया | उसने विनय पिटक का संकलन भी किया |

उपगुप्त

उपगुप्त (अशोक का समकालीन) बौद्ध धर्मावलम्बी था तथा विख्यात बौद्ध भिक्षु था | अपने उपदेशों के द्वारा भारत में बौद्ध धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी | कलिंग के रक्तरंजित युद्ध के पश्चात अशोक उपगुप्त के सम्पर्क में आया तथा उससे प्रभावित होकर उसका शिष्य बन गया | अपने शासन के 14वें वर्ष में अशोक द्वारा की गई बौद्ध तीर्थों की यात्राओं में उपगुप्त भी उसके साथ था |

वाचस्पति मिश्र

वाचस्पति मिश्र प्राचीन भारत का प्रमुख दार्शनिक एवं सभी भारतीय दर्शनों का परम प्रवीन आचार्य माना गया है (किन्तु उनकी विशेषज्ञता नाय दर्शन के क्षेत्र में दिखाई देती है) इन्होने उधोतर के न्यायवार्तिक पे टीका न्यायवावर्तीकातात्पर्य तथा न्यायसूची निबंध नामक ग्रंथो की रचना की जिसमे न्यायसूत्रों का संकलन किया गया है |

वाग्भट्ट (सातवीं सदी)

प्राचीन भारत के आयुर्वेदाचार्यो में बाग्भट्ट का महत्वपूर्ण स्थान है | इन्होने आयुर्वेद पर अष्टांग हृदय नामक ग्रन्थ की रचना की | यह ग्रन्थ आयुर्वेद का विख्यात ग्रन्थ है | इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतो का प्रतिपादन किया गया है |

वाल्मीकि

वाल्मीकि प्राचीन भारत के प्रमुख ऋषि थे | (कहा जाता है की ये पहले एक खूखार डाकू थे) किन्तु बाद में उच्च कोटि के साधू बन गये तथा रामायण की रचना की, जो हिन्दुओ का विख्यात तथा पवित्र धार्मिक महाकाव्य है |

वराहमिहिर (5वीं सदी)

वराहमिहिर गुप्तकालीन का महान ज्योतिषी था | जिसने ज्योतिषशास्त्रों को तीन भागो- तंत्र, हीरो एवं संहिता में बांटा है || उन्होंने नक्षत्र विद्या पर पंचसिद्धान्तिका नामक विख्यात ग्रन्थ की रचना की जिसमे नक्षत्र विद्या सम्बन्धी पांच सिद्धांतो- पैतामह, रोमक, पोलिस, वशिष्ठ तथा सूर्य का वर्णन किया गया है | ज्योतिष पर वृह्त्जातक वृहतसंहिता तथा लघुजातक आदि लिखे गये है | ज्योतिष पर लिखा गया उसका सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ वृह्त्संहिता है |

वसुबंध

प्राचीन भारत के बौद्ध धर्माचार्यो में शुमार वसुबंध पुरुषपुर (पेशावर) के रहने वाले थे तथा विख्यात बौद्ध दार्शनिक असंग के छोटे भाई थे | आरम्भ में इन्होने सर्वास्तिवाद पर अभिधर्मकोष नामक विख्यात ग्रन्थ की रचना की | बाद में ये विज्ञानवाद अथवा योगाचार सम्प्रदाय से जुड़ गये | इसके पश्चात उन्होंने विज्ञप्तिमात्रतासिद्धि नामक ग्रन्थ लिखा जो विज्ञानवाद का सर्वाधिक प्रमाणिक ग्रन्थ माना जाता है | इसके अलावा उन्होंने असंग को महायान सम्परिग्रह नामक ग्रन्थ पर एक टीका भी लिखी थी |



सवुमित्र (783-795 ई.)

वसुमित्र कनिष्क के समकालीन थे तथा उसके दरबारी थे | उन्होंने कनिष्क के द्वारा जम्मू कश्मीर के कुण्डलवन में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता की | उनकी देख-रेख में ही महाविभाष्य नामक ग्रन्थ का संकलन किया गया था जो बौद्ध धर्म का महाकोष माना गया है |

वात्स्यायन (2 सदी ई.पू,)

वात्स्यायन का मूल नाम मल्ल्नाग था | ये न्यायालय के अच्छे विद्वान् थे तथा इन्होने गौतम के न्याय सूत्र पर भाष्य तथा कामसूत्र नामक विख्यात ग्रन्थ की रचना की थी | यह ग्रन्थ प्राचीन भारतीय जीवन पद्धति तथा दिनचर्या के संबन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी देता है |

वेदव्यास

प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण ऋषि वेदव्यास ने महाभारत तथा 18 पुराणों की रचना की | महाभारत को रामायण के पश्चात हिन्दुओं का दूसरा प्रमुख महाकव्य माना जाता है |

विशाखदत्त

विशाखदत्त गुप्तकालीन नाटककार थे जिन्होंने मुद्राराक्षस तथा देवीचन्द्रगुप्तम नाम के ग्रन्थ लिखे | मुद्राराक्षस नामक नाटक में उन्होंने चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा मौर्य वंश की स्थापना पर प्रकाश डाला है तथा उसे वृषल कुलहीन कहकर पुकारा है | देवीचन्द्रगुप्तम में गुप्त शासक रामगुप्त तथा उसकी पत्नी ध्रुवदेवी की कथा का वर्णन किया गया है | उनके नाटक वीर रस प्रधान, ओजपूर्ण भाषा तथा सुंदर चरित्र-चित्रण वाले है |

विष्णु शर्मा
गुप्तकालीन विद्वान विष्णु शर्मा पंचतंत्र के लिए विख्यात है जो कई कथाओं का संकलन है |

वाक्पतिराज

प्राचीन भारत के ऐतिहासिक काव्य रचानाओ में वाक्पतिराज का महत्वपूर्ण स्थान है | ये मालवा के नरेश यशोवर्मन के दरबारी तथा आश्रित कवि थे | जिन्होंने गौड़वध अथवा गौड़वहो नामक ग्रन्थ की रचना प्राकृत भाषा में की |

याज्ञवल्क्य

प्राचीन भारतीय ऋषियों तथा धर्म शास्त्रों में याज्ञवल्क्य का महत्वपूर्ण स्थान है | इन्हें याज्ञवल्क्य स्मृति का रचनाकार माना जाता है, इसमें विभिन्न सामजिक व धार्मिक नियमों तथा विधानों का वर्णन किया गया है |

अश्वघोष

विख्यात विद्वान तथा बौद्ध पण्डित, जिसका जन्म मगध में हुआ था, किन्तु बाद में वह कनिष्क के दरबार में था तथा पेशावर में रहने लगा | वह कवि, संगीतज्ञ, विद्वान, दार्शनिक, नाटककार तथा कुशल शास्त्रार्थ में निपुण बौद्धाचार्य था | उसने चतुर्थ बौद्ध संगीति में भाग लिया तथा बौद्ध धर्म के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | उसने बुद्धचरित नामक महाकाव्य में बुद्ध के उपदेशों पर प्रकाश डाला है | सौन्दरानन्द, व्रजसूची तथा सूत्रालंकार आदि इसकी अन्य रचनाएं है | एक नाटकार के रूप में अश्वघोष की रचनाओं में सारिपुत्र प्रकरण प्रमुख है |

देवदत्त

यह महात्मा बुद्ध का चचेरा भाई था जो आरम्भ से ही उसे ईर्ष्या करता था उनके विरुद्ध षड्यंत्र रहता था | यधपि उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था तथापि मतभेदों के कारण बाद में इसको छोड़ दिया तथा अपना एक नया मत स्थापित किया |

धनानन्द

यह नन्द वंश का अंतिम शासक था, यूनानी लेखकों ने इसे अग्रमीज कहा है | सिकंदर के आक्रमण के समय वह मगध का शासक था तथा उसके भय से ही सिकंदर के सैनिक व्यास नदी के किनारे से वापस लौट गये थे | चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ई.पू. में धनानंद को परास्त कर व मगध पर अधिकार कर मौर्य वंश की स्थापना की |

धन्वन्तरी

ये प्राचीन भारत (गुप्तकालीन)के महान चिकित्साशास्त्री थे | तथा सम्भवतः चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (375-414 ई.) के दरबार में थे | इन्होने आयुर्वेद के क्षेत्रों में अनेक नवीन खोजे की इसी कारण आयुर्वेद चिकित्सा का पिता कहा जाता है | इन्होने निघन्तु नामक ग्रन्थ की रचना की जिसके अंतर्गत विभिन्न बीमारियों तथा उनके उपचार के लिए विभिन्न आयुर्वेदिक रीतियों का वर्णन किया गया |

धर्मपाल (770-810 ई.)

यह पाल वंश का सर्वाधिक गोग्य शासक था जो अपने पिता गोपाल की मृत्यु के पश्चात 770 ई. में गद्दी पर बैठा | गुजराती कवि सोडढल ने उसे उत्तरापथस्वामिन के नाम दिया है | उसने कन्नौज से शासक इन्द्रायुध से हटाकर चक्रायुध को अपने संरक्षण में कन्नौज का शासक बनाया किन्तु नागभट्ट दितीय (प्रतिहार) तथा राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव के परास्त हुआ | वह बौद्ध था तथा उसके द्वारा अनेक मठो तथा विहारों का निर्माण करावाया गया था | नालन्दा विश्वविद्यालय के व्यय हेतु उसने 200 गाँवों के आय दान में दी थी | उसने बिहार के भागलपुर जिले में पाथरघाट नामक स्थान पर विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की जो शीघ्र ही शिक्षा का विख्यात केन्द्र बन गया |

दिड्नाग (चौथी सदी)

ये महान बौद्ध दार्शनिक तथा विद्वान थे (महायान सम्प्रदाय की योगाचार शाखा) | इन्होने कई ग्रंथो की रचना की जिनमे प्रमाणसमुच्चय, प्रमाणसमुच्चिका, हेतुचक्रहार, प्रमाणशाश्त्र, न्यायप्रदेश, आलम्बन परीक्षा एवं इसकी वृत्ति तथा न्यायद्वार या न्यासुख आदि प्रमुख है |

दिवाकर

ये हर्ष के विख्यात बौद्ध भिक्षु थे | जब हर्षवर्धन अपनी बहिन राज्यश्री को जंगलो में ढूढ रहा था तो उसकी मुलाक़ात दिवाकर मित्र से हुई थी | हर्ष उनसे प्रभावित हुआ तथा उन्हें गुरु बनाकर बौद्ध धर्मं स्वीकार कर लिया | दिवाकर मित्र की सहायता से हर्ष ने राज्यश्री की ढूढ निकाला |

दण्डी

ये संस्कृत गध्य के महत्वपूर्ण विद्वानों में से एक तथा पल्लव शासक नरसिंह वर्मन-2 (690-715 ई.) के दरबारी थे | इन्होने अनेक ग्रंथो (काव्यादर्शण, दशकुमारचरित तथा अवन्तिसुन्दरी कथा) की स्थापना की | ये संस्कृत साहित्य में अपने पद लालित्य हेतु विख्यात है |

फाइयांन

फाइयांन (मूल नाम कुंग) एक चीनी यात्री था, जो भारत में बौद्ध धर्म के तीर्थ स्थानों की यात्रा करने तथा बौद्ध धर्म के मूल ग्रन्थों का अध्ययन करने हेतु गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में भारत आया था | वह 399 ई. में चीन से रवाना हुआ तथा भारत में पंजाब, मथुरा, कन्नौज, काशी, पाटलिपुत्र अदि नगरों की यात्रा की एवं ताम्रलिप्ति बंदरगाह से लंका व जाबा होते हुए चीन लौट गया | उसने अपना विवरण अपने ग्रन्थ ‘फ़ो-क्वो-की’ में दिया है |

गौड़पाढ

शंकराचार्य के पूर्व दार्शनिकों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है | उन्होंने कई दार्शनिक ग्रंथो की रचना की जिसमे मांडूक्यकारिका (सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रन्थ) तथा उत्तर गीता का भाष्य की रचना की |

गौतम

ये एक विद्वान ऋषि तथा दार्शनिक थे जिन्हें अक्षपाद भी कहा जाता है | ये न्याय दर्शन के प्रवर्तक थे |( जो मुख्यत: बौद्धिक विश्लेष्णात्मक तथा तार्कीक) इसे विद्या, प्रमाणशास्त्र, तर्कशास्त्र, हेतुविधा, आन्विक्षकी आदि नामो से पुकारा जाता है | इसका मूल ग्रन्थ न्यायसूत्र है | जिस पर कालान्तर में वात्स्यायन ने न्यायभाष्य नामक टीका लिखी है |

गौतम बुद्ध (563ई.पू.-483 ई.पू,)

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक जिका जन्म 563 ई.पू, में कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी वन में हुआ था | इनक मूल नाम सिद्धार्थ था | इसके पिता का नाम शुद्दोधन व माता का नाम महामाया था | इनका विवाह राजकुमारी यशोधरा से हुआ तथा राहुल नामक पुत्र उत्पान हुआ | 29 वर्ष की आयु में ये घर छोड़कर चले गये (यह घटना महाभिनिष्क्रमण कहलाती है ) वृद्ध व्याधिग्रस्त मनुष्यम, मृतक तथा सन्यासी को देखकर उनमे विरक्ति भाव उत्पान्न हुए | उन्होंने अलार कलाम को गुरु बनाया तथा कठोर साधना की, परन्तु संतुष्ट नहीं हुए | 35 वर्ष की आयु बौद्ध गया में इन्हें निरंजना नदी के किनारे पर कठोर तपस्या और ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा सिद्धार्थ अब बुद्ध कहलाये | उन्होंने सारनाथ में प्रथम धर्म उपदेश दिया | यह घटना धर्मंचक्र प्रवर्तन कहलाती है | अन्तत: 483 ई.पू. में बैशाख मास की पूर्णिमा के दिन 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उनकी मृत्यु हो गई |(जिसे महापरिनिर्वाण कहा गया है ) उन्होंने चार आर्य सत्य दुःख. दुःख समुदाय, दुःख निरोध तथा दुःख निरोगी मार्ग का प्रतिपादन किया | दुःख से छुटकारा पाने हेतु उन्होंने अष्टांगिक मार्ग सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक कर्म, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति तथा सम्यक समाधि का प्रतिपादन किया | उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाने का बल दिया तथा भिक्षुओं के लिए दस शील का प्रतिपादन किया | उन्होंने सदाचार, स्वालम्बनम, अहिंसा पर बल दिया तथा वेदों की प्रमाणिकता का खंडन किया | इन्होने प्रतीत्य समुत्पाद नियम अथवा प्रत्येक घटना के पीछे कारक की उपस्थिति के नियम तथा क्षणिकवाद का प्रतिपादन किया | उनके बौद्ध धर्म का भारत तथा विदेशों में बहुत प्रचार हुआ |

जैमिनी

ये प्राचीन भारत के महान दार्शिनिक थे | जिनके द्वारा प्रतिपादित दर्शन ‘पूर्व मीमांसा’ के नाम से विख्यात है | इनका प्रमुख ग्रन्थ मीमांसा सूत्र जिस पर शबर स्वामी ने शबर भाष्य नामक टीका लिखी | इन्होने मीमांसा का प्रधान विषय भेद बताया है तथा वेदों को ही धर्म का मूल बताया है | यह जगत तथा उसके समस्त विषयों के सत्यता को स्वीकार करते है | इनका धर्म के सिद्धांत में विश्वास था तथा इनकी धारणा थी की धर्म से ही जगत की दृष्टि होती है | इनका अनेकात्मकवाद में विश्वास था |

घोषा

यह के प्राचीन वैदिककालीन विदुषी स्त्री थी जिसके अनेक सूक्तो की रचना की थी जीका संग्रह हमे ऋग्वेद में दिखाई देता है |

गोपराज

यह गुप्त शासक भानुगुप्त (508-30ई.) का सेनापति था | उसने कई युद्दों में वीरता का प्रदर्शन किया था | जब 510 ई. में तोरमाण के नेतृत्व में हूणों ने भारत पर आक्रमण किया, तो गोपराज के नेतृत्व में गुप्त सेना में हूणों का डटकर मुकाबला किया तथा वीरतापूर्वक लड़ते हुए गोपराज वीरगति को प्राप्त हुआ | उसकी मृत्यु के पश्चात उसकी पत्नी अपने पति के साथ सती हो गई | प्राचीन भारत में सती प्रथा का प्राचीनतम साक्ष्य है |

गोशाल

ये इतिहास में मक्खलिपुत्त गोशाल के नाम से विख्यात है | जो नालन्दा में महावीर स्वामी से मिले तथा उनके शिष्य बन गये ; उन्होंने महावीर से पृथक होकर एक नवीन सम्प्रदाय की स्थापना की | इस सम्प्रदाय के साधू नग्न रहते थे | गोशाल ने नियतिवाद अथवा भाग्यवाद के सिद्धांत का प्रतिपादन किया |

गुणाद्य

प्राचीन भारतीय कथाकारों में गुणाद्य महत्वपूर्ण स्थान रखता है | वह सातवाहन शासक हाल जो प्रथम-दितीय सदी में हुआ था, का दरबारी कवि था | उसने वृह्त्कत्था नामक विख्यात की रचना की |

हेन्सांग (624-644 ई.)

एक चीनी यात्री व बौद्ध भिक्षु हेन्सांग जिसे नीति का पंडित यात्रियों का राजकुमार भी कहा गया है | यह भारत में बौद्ध धर्म ग्रंथो का अध्ययन करने तथा बौद्ध तीर्थ स्थलों के दर्शन के उद्देश्य से हर्षवर्धन (606-48 ई.) के समय आया था | इसने नालन्दा विश्वविद्यालय म अध्ययन किया तथा वहाँ का उपकुलपति भी रहा | उसका यात्रा वृत्तांत सी.यू.की. के नाम से विख्यात है | उसने कन्नौज सम्मेलन की अध्यक्षता की जहाँ हर्ष ने उसे महायानदेव की उपाधि के अलंकृत किया तथा उसने प्रयोग सम्मेलन (643ई.) में भी भाग लिया |

हरिषेण

यह गुप्कालीन का विख्यात विद्वान था | हरिषेण महादंडनायक ध्रुवभूति का पुत्र था यह समुद्रगुप्त का महत्वपूर्ण अधिकार था | वह उसके समय में कुमारामात्य. महादंडनायक तथा संधिविग्रह के पदों पर रहा | उसने  प्रयाग प्रशस्ति की रचना की जिससे हमे समुद्रगुप्त मौर्य की उपलब्धियों, उसकी विजयों तथा सांस्कृतिक परपराओं का परिचय मिलता है |

इलंगो आदिगल

यह एक महान संगमकालीन कवि था जिसने शिलापादिकारम नामक महाकाव्य लिखा, इसे तमिल साहित्य का इलियड कहा गया है |

इत्सिंग (675-695 ई.)

यह एक चीनी बौद्ध चीनी यात्री था जो 675 ई. में भारत आया था \ उसने करी वर्षो तक नालन्दा व विक्रमशिला विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था | इसने भारत और मलय द्वीपों में प्रचलित धर्म का विवरण नामक ग्रन्थ लिखा |

पकुधकच्चायन

यह छटी शताब्दी ई.पू, में प्रमुख दार्शनिक थे | जिन्होंने वैदिक धर्म के आडम्बरों कर्मकांडो एवं जटिलता की आलोचना की तथा भौतिकता पर बल दिया | इन्होने पुनर्जन्म तथा कर्म की सत्यता को अस्वीकार कर दिया | इन्होने सात तत्वों- पृथ्वी, जल, तेज, वायु, दुःख तथा जीवन को माना तथा उन्हें अनियमित तथा अबाध्य के रूप में प्रतिपादित किया |

खारवेल  

यह कलिंग का वीर एवं प्रतापी शासक था जिसके बारे में हाथीगुम्फा अभिलेख से वार्षिक रूप से विवरण मिलता है | यह पहली सदी ई.पू. में हुआ था तथा इसका संबंध खारवेल के चेदि वंश से था | इसे एरा, महाराज, मेघवाहन, कलिंगाधिपती आदि नामो से पुकारा जाता है | उसने अनेक विजये प्राप्त की जिनमे मगध के शासक बृहस्पति मित्र तथा दक्षिण के सातवाहन शातकर्णी पर विजये प्रमुख है | इसके अतिरिक्त पांड्यों तथा यवनों को भी परास्त किया था | उसने कृषि हेतु नहरों का निर्माण करवाया तथा प्राची नदी के दोनों तटो पर ‘महाविजयप्रसाद’ नामक महल बनवाया | वह जैन धर्म का अनुयायी था तथा उसके जैन धर्म के लिए विहार बनवाए |