राजस्थान के इतिहास का पूर्व मध्यकाल एवं मध्यकाल


राजस्थान के इतिहास का पूर्व मध्यकाल एवं मध्यकाल

  • दक्षिण भारत के एक जाती राष्ट्रकूट से “राठौड़ “ शब्द बना |
  • मुहणोत नैणसी के अनुसार राठौड़ , कन्नौज के शासक जयचंद गहडवाल के वंशज है | इस मत का समर्थन दयालदास जी री ख्यात , जोधपुर री ख्यात व पृथिवीराज रासो में किया गया है |
  • पं. गौरीशंकर हीराचंद ओझा राठौड़ो को बदायूं के राठौड़ो के वंशज मानते है |
  • राठौड़ वंश का संस्थापक राव सीहा को माना है जिसने सर्वप्रथम पाली के निकट अपना छोटा सा साम्राज्य स्थापित किया है |



जोधपुर के राठौड़

  • राव सीहा के वंशज वीरमदेव का पुत्र राव चुडा जोध्पुर्के राठौड़ वंश का प्रथम प्रतापी शासक था जिसने मंडोर दुर्ग के मांडू से सुल्तान के सूबेदार से जीतकर अपनी राजधानी बनाया | राव चुडा के ज्येष्ठ पुत्र राव रणमल को उत्तराधिकारी न बनाने पर वह मेवाड़ के महाराणा लाखा के पास चला गया तथा मेवाड़ की सेना की सहायता से रणमल ने मंडोर पर अधिकार कर लिया |

राव जोधा ( 1453 – 1489 ई. )

  • राव जोधा ने 1453 ई. में पुन: मंडोर पर अपना अधिकार कर लिया | राव जोधा ने 1459 ई में चिड़िया टुंक पहाड़ी पर मेहरानगड दुर्ग का निर्माण करवाया एवं जोधपुर नगर की स्थापना की |
  • राव जोधा के पुत्र राव बीका ने बीकानेर में राठौड़ वंश की नीव डाली |
  • 1489 ई. में राव जोधा की मृत्युपरान्त राव सातल ( 1490 – 92
    ) तथा इसके पश्चात राव सूजा ( 1492 – 1515 ) ने जोधपुर मारवाड़ पर शासन किया |

राव गांगा ( 1515 – 1531ई. )

  • राव गांगा 1515 ई. में मारवाड़ का शासक बना |वह राणा सांगा का मित्र था और उसने 4000 सैनिको के मालदेव के नेतृत्व में भेजकर खानवा के युद्ध में सांगा की मदद की थी |
  • डा. ओझा के अनुसार कुंवर मालदेव इतना बड़ा मह्त्वाकांसी था उसके अफीम की पिनक में बैठे हुए राव गांगा को उपर खिड़की से नीचे गिरा दिया जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गई |

राव मालदेव ( 1531 – 1562 ई.)

  • 5 जून 1531 को राव मालदेव जब जोधपुर की गद्दी पर बैठा तब दिल्ली में हुमायूं का शासन था |
  • मालदेव का राज्य रोहण सोजत में हुआ था , क्यों की जोधपुर उस समय षड्यंत्रों का केन्द्र बना हुआ था
  • मालदेव का विवाह जैसलमेर के शासक लूणकरणसर की पुत्री ऊमा दे के साथ हुआ था | उमा दे शादी की पहली रात को ही रूठ गई थी जो आजीवन रूठी रही इतिहास में उसे रूठी रानी कहा जाता है एवं उसने अपना जीवन तारगड अजमेर में गुजरा |
  • मालदेव ने राव जैतसी को हराकर बीकानेर पर 1541 ई. में अधिकार कर लिया
  • गिरी सुमेल का युद्ध ( 1544 ई. ) – शेरशाह सूरी ने दिल्ली व आगरा पर अधिकार कर लेने के पश्चात मारवाड़ पर आक्रमण किया | “गिरी सुमेल ( जैतारण , पाली ) “ नामक स्थान पर मालदेव व शेरशाह सूरी के मध्य भयंकर युद्ध हुआ जिसमे शेरशाह सूरी छल-कपट से विजयी हुआ | इस युद्ध में मालदेव के वीर सेनानायक जैता कुंपा वीरगति को प्राप्त हुए |इस युद्ध में बीकानेर के राव कल्याणमल व मेड़ता के वीरमदेव ने शेरशाह का साथ दिया | जोधपुर विजय के पश्चात शेरशाह ने किले का प्रबंध खवास खां को सौप जिसे हारकर मालदेव ने पुन: अधिकार कर लिया |गिरी सुमेल के विजय के पश्चात शेरशाह सुरी ने मालदेव के सैनिको को वीरता से प्रभावित होकर कहा की “ मै एक मुट्ठी भर बाजरे के लिए दिल्ली की बादशाहत खो देता |

राव चन्द्रसेन ( 1562 – 1583 ई. ) –

  • 1562 ई. में मालदेव की मृत्युपरान्त उसका पुत्र चन्द्रसेन राजगद्धी पर बैठा जिससे मालदेव के ज्येष्ठ पुत्र उदयसिंह नाराज होकर अकबर के पास चला गया अकबर ने हुसैनकुली के नेतृत्व में सेना भेजकर जोधपुर पर अधिकार कर लिया और चन्द्रसेन भाद्राजून चले गये |
  • अकबर ने नवम्बर 1570 ई. को नागौर में ‘नागौर दरबारआयोजित किया जिसमे जैसलमेर नरेश रावल हरराय , बीकानेर नरेश राव कल्याणमल एवं उनके पुत्र रायसिंह वसा चन्द्रसेन के भाई उदयसिंह ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली | रायसिंह की जोधपुर का शासन संभलाया |
  • राव चन्द्रसेन मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं करते हुए अन्तिम समय तक संघर्ष करता रहा इस कारण उन्हें अकबर का माहाराणा प्रताप , मारवाड़ का भुला भटका शासक कहते है |

मोटा राजा राव उदयसिंह ( 1583 – 1595 ई. ) –

  • राव मालदेव के पुत्र व चन्द्रसेन के बड़े भ्राता उदयसिंह 4 अगस्त 1583 ई. को जोधपुर के शासक बने |
  • उदयसिंह मारवाड़ के प्रथम शासक थे जिन्होंने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर अपनी पुत्री मानबाई का विवाह शहजादे सलीम ( जहागीर ) के किया |
  • उदयसिंह की मृत्यु 1595 ई. को लाहौर में हुई |

सवाई राजा शूरसिंह ( 1595 – 1619 ई. ) –

  • राजा उदयसिंह के पुत्र शुरसिंह ने 1595ई. में जोधपुर का शासन संभाला | अकबर ने उन्हें सवाई राजा की उपाधि दी |



महाराजा गजगिंह ( 1619 – 1638 ई. ) –

  • शूरसिंह के पुत्र गजसिंह 8 अक्टूम्बर 1619 ई. को जोधपुर के शासक बने | जहांगीर ने उन्हें दलथन की उपाधि दी व उनके घोड़ो को शाही दाग के मुक्त किया
  • गजसिंह की मृत्यु आगरा में 1638 में हुई |

महाराजा जसवंत सिंह प्रथम ( 1638 – 1678 ई. )

  • गजसिंह के पुत्र जसवंत सिंह का 1638 ई. में आगरा में राजतिलक किया गया | शहाजहां ने उन्हें महाराजा की उपाधि दी  | शाहजहां के पुत्रो के उत्तराधिकार संघर्ष में जसवंत सिंह ने दारा शिकोह के पक्ष में धरमत ( उज्जैन ) के युद्ध में शाही सेना का नेतृत्व किया जिसमे औरंगजेब विजयी रहा | पुन: दौराई ( अजमेर ) के युद्ध में औरंगजेब ने डरा निकोह को शिकस्त दी
  • औरंगजेब ने दिल्ली का सुल्तान बनने के बाद जसवंत सिंह को सर्वप्रथम दक्षिण अभियान तत्पश्चात काबुल अभियान पर भेजा , जहां उसकी मृत्यु हो गई | जसवंत सिंह की मृत्यु पर औरंगजेब ने कहा था की आज क्रुफ़ का दरवाजा टूट गया | जसवंत सिंह की मृत्यु उपरान्त उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं होने के कारण जोधपुर राज्य को मुगल साम्राज्य में मिला लिया |
  • जसवंत सिंह के दरबारी मुह्नौत नैनसी ने मारवाड़ के परगने री विगत व मुह्नौत नैनसी री ख्यात नामक ग्रन्थ लिखे | राजपूताने को जोधपुर का अबुल फजल नाम से प्रसिद्ध मुह्नौत नैनसी के अंतिम दिन जेल में बीते |

महाराजा अजीत सिंह ( 1707 – 1724 ई. )

  • जसवंत सिंह की मृत्युपरान्त 19 फरवरी 1679 ई. को उसकी गर्भवती रानी ने लाहौर में राजकुमार अजीतसिंह को जन्म दिया | औरंगजेब इनकी हत्या करना चाहता था लेकिन दुर्गादास राठौड़ ने अन्य सरदारों के साथ राजकुमार को सुरक्षित निकलकर कालन्द्री ( सिरोही ) में जयदेव ब्राहमण के यहाँ इनकी परवरिश की तथा अजीतसिंह को जोधपुर की गद्धी पर बिठाया |
  • अजीतसिंह ने बहकावे में आकर दुर्गादास को राज्य से निष्कासित कर दिया तब वे मेवाड़ चले गये | बाद में दुर्गादास ,ओ मृत्यु उज्जैन में हुई यहाँ उनकी समाधि क्षिप्रा नदी के तट पर बनी हुई है |
  • महाराजा अजीतिंह ने मुगल बादशाह फर्रुखशियर से संधि कर अपनी पुत्री इन्द्र कँवर का विवाह सुल्तान से कर दिया |
  • महाराजा अजीतसिंह की हत्या उनके पुत्र बख्तसिंह ने 23 जून 1724 को कर दी गई |

महाराजा अभयसिंह ( 1724 – 1801 ई. )

  • अजीत सिंह के उत्तराधिकारी अभयसिंह हुए उनके शासन काल ने 1730 ई. में जोधपुर राज्य के खेजडली गाँव में अमृता देवी के नेतृत्व में वृक्षा की रक्षा हेतु 363 लोगो ने बलिदान दिया | यहाँ प्रतिवर्ष विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला लगता है |

महाराजा मानसिंह ( 1803 – 1818ई. )

  • 1803 ई. में जोधपुर के सिंहासन पर उत्तराधिकारी संघर्ष के पश्चात भीमसिंह को पदच्युत करके महाराजा मानसिंह ने कब्ज़ा जमाया | अपने संघर्ष काल में जालोर में मारवाड़ की से घिरे मानसिंह को नाथ सम्प्रदाय के आयस देवनाथ ने जोधपुर के शासक बनने की भविष्वाणी कर आशीर्वाद दिया |
  • मानसिंह ने अपने जीवन काल में ही 1817 ई. में अपने पुत्र छात्रसिंह को गद्धी सौप दी | लेकिन शीघ्र ही छत्तरसिंह की मृत्यु हो गई तत्पश्चात महाराजा मानिसंह ने 6 जनवरी 1818 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि कर ली |

बीकानेर के राठौड़

बीकानेर में राठौड़ वंश की नीव करणी माता के आशीर्वाद के राव जोधा के पुत्र राव बीका ने 1465 ई. में रखी तथा 1468 ई. में बीकानेर नगर को बसाया |

राव लूणकरणसर

  • 1504 ई. में राव नरा ( बीका के ज्येष्ठ पुत्र ) की मृत्यु के पश्चात राव लूणकरणसर बीकानेर के शासक बने जिन्होंने जैसलमेर के नरेश राज जैतसी को हराया तथा नारनोल पर आक्रमण ( 1526 ई. ) किया | इन्हें कलियुग का कर्ण के नाम से विभूषित किया गया |

राव जैतसी ( 1526 – 1542ई. )

  • इनके शासनकाल ने बाबर के पुत्र व लाहौर के शासक कामरान ने 1534 ई. में भटनेर पर अधिकार करने के पश्चात बीकानेर पर आक्रमण किया | 26 अक्टूम्बर 1534 ई. को इसने राव जैतसी को हराकर बीकानेर पर कब्जा किया लेकिन राव जैतसी ने शीघ्र ही पुन: बीकानेर पर अधिकार किया | इस युद्ध का वर्णन बीठा सुजा ने अपने ग्रन्थ ‘राव जैतसी रो छन्द ‘ में किया है |
  • राव मालदेव ने पहोबा के युद्ध में राव जैतसी को हराकर बीकानेर पर अधिकार किया , इस युद्ध में राव जैतसी वीरगति को प्राप्त हुए |

राव कल्याणमल ( 1544 – 1574 ई. )

  • राव कल्याणमल ने गिरी सुमेल के युद्ध में मालदेव के विरुद्ध शेरशाह सूरी क सहायता की जिससे प्रसन्न होकर युद्ध में विजय के पश्चात शेरशाह सूरी ने बीकानेर का शासन राव कल्याणमल को सौप दिया |
  • 1570 ई. में नागौर दरबार में राव कल्याणमल व उसके पुत्र रायसिंह ने उपस्थित होकर अकबर की अधीनता स्वीकार की |
  • राव कल्याणमल के पुत्र पृथ्वीराज राठौड़ अकबर के नवरत्न में से एक थे | इन्होने प्रसिद्ध ग्रन्थ वेली क्रिसन रुकमनी री की रचना की |




महाराजा रायसिंह ( 1574 – 1612ई. )

  • अकबर ने 1572 रायसिंह को जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया जो अपने पिता की मृत्यु में पश्चात 1574 ई. ने बीकानेर की गद्दी पर वैठे थे |
  • रायसिंह दो मुगल बादशाह – अकबर व जहांगीर की सेवा मे रहे |
  • बीकानेर के प्रसिद्ध दुर्ग जुनागड़ का निर्माण करवाकर किले में राय प्रशस्ति लिखवाई |
  • अकबर की अहमद नगर पर विजय प्राप्त करने तथा बलूची विद्रोह दबाने में भी रायसिंह ने महत्पूर्ण योगदान दिया |
  • रायसिंह ने शहजादे सलीन को बादशाह बनने में सहायता की जिससे प्रसन्न होकर जहांगीर ने 5000 का मनसब प्रदान कर दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया | वही बुरहानपुर में 1612 ई. में उनका निधन हो गया | मुंशी देवी प्रसाद ने महाराजा रायसिंह को राज्पुताने का कर्ण कहा है |

महाराजा सूरज सिंह ( 1613 – 1669 ई. )

  • मुगलों के शाही फरमान के अनुसार वह उच्चकुल के राजाओ में सर्वश्रेष्ठ था |इससे स्पष्ट होता है की वह एक श्रेष्ठ शासक था |

कर्णसिंह ( 1631 – 1669 ई. )

  • 1631 ई. में बीकानेर के सिंहासन पर बैठे महाराजा कर्णसिंह को अन्य राजपूतो शासको ने जालंधर बादशाह की उपाधि धारण की |
  • देशनोक ( बीकानेर ) के करणी माता के वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया |
  • कर्णसिंह ने शाहजहाँ व औरंगजेब दो मुगल बादशाहों की सेवा की |

महाराजा अनूप सिंह ( 1669 – 1698 ई. )

  • औरंगजेब ने इन्हें ‘महाराजा ‘ व माहीभरातिव की उपाधियाँ प्रदान की |
  • अनूपसिंह विद्वान व संगीत प्रेमी थे | इनके दरबारी कवि भावभट्ट ( संगीतज्ञ ) ने अनूप संगीत रत्नाकर , संगीत अनुपंकुश एवं अनूप संगीत विलास की रचना की |
  • 1818 ई. में बीकानेर के शासक सूरतसिंह ने अग्रेज से संधि कर ली |

किशनगड के राठौड़

किशनगड में राठौड़ वंश की नीव किशनसिंह ( मोटा राजा उदयसिंह के पुत्र ) ने 1609 ई. में डाली |

  • सावंत सिंह यहाँ के प्रसिद्ध शासक हुए जोप शासन त्याग कर वृन्दावन जाकर कृष्णभक्ति में लीं हो गये तथा नगरीदास के नाम से प्रसिद्ध हुए |
  • महाराजा सावंतसिंह के शासनकाल में प्रसिद्ध चित्रकार मोरध्वज निहालचंद हुआ , जिसने राजस्थानी चित्रकला का श्रेष्ठ चित्र बनी-ठनी बनाया |

चौहान राजवंश

शाकम्भरी व अजमेर के चौहान

  • चौहान वंश का मूल स्थान सांभर के निकट सपाद्ल्क्ष क्षेत्र को माना जाता है इसकी प्रारम्भिक राजधानी अहिच्छत्रपुर ( नागौर ) थी |

वासुदेव

  • वासुदेव चौहानों का प्रथम शासक 551 ई. में बना |
  • वासुदेव के पश्चात नरदेव म विग्रहराज , दुर्लभराज , अजयराज , अर्णोराज , पृथ्वीराज तृतीय प्रमुख चौहान शासक हुए |

विग्रहराज दितीय

  • चौहान वंश का प्रथम प्रतापी शासक विग्रहराज दितीय हुआ | जिसने 965 ई. में सपादलक्ष तथा चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को हराया |

अजयराज

  • चौहान राजवंश के शासक अजयराज ने 1113 ई. में अजयमेरु नगर ( अजमेर ) की स्थापना करके इसे अपनी राजधानी बनाया एवं अजयमेरु दुर्ग का स्थपना की |

अर्णोराज ( आनाजी )

  • अजयराज के पुत्र अर्णोराज ने 1133 से 1155 ई. तक शासन किया | इसने लुका को हराया अजमेर में आना सागर झील व पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण करवाया |

विग्रहराज चतुर्थ ( बीसलदेव )

  • 1158 ई. में शासक बने विग्रह राज चतुर्थ राज ने गजनी के शासक अमीर खुशरुशाह ( हम्मीर ) को हराकर राज्य का विस्तार किया तथा तोमरो को हराकर दिल्ली पर अधिकार किया
  • विग्रहराज चतुर्थ का शासन काल चौहान वंश का स्वर्ण युग कहलाता है |
  • विग्रहराज चतुर्थ ने ‘हेरिकेलि’ नाटक तथा इनके दरबारी कवि विद्वान सोमदेव ने ललित विग्रह नामक नाटक लिखा |
  • विग्रहराज को विद्वानों के आश्रय दाता होने के कारण कवि बान्धव की उपाधि दी गई |
  • विग्रहराज चतुर्थ ने अजमेर में संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया , जिसे तोड़कर कुतुबुद्दीन ने ढाई दिन का झोपड़ा नमक मस्जिद बनाई |

पृथ्वीराज तृतीय ( पृथ्वीराज चौहान )

  • अन्हील्पातटन




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